87

3.2.87

चौपाई
સીતા સચિવ સહિત દોઉ ભાઈ। સૃંગબેરપુર પહુે જાઈ।।
ઉતરે રામ દેવસરિ દેખી। કીન્હ દંડવત હરષુ બિસેષી।।
લખન સચિવસિયકિએ પ્રનામા। સબહિ સહિત સુખુ પાયઉ રામા।।
ગંગ સકલ મુદ મંગલ મૂલા। સબ સુખ કરનિ હરનિ સબ સૂલા।।
કહિ કહિ કોટિક કથા પ્રસંગા। રામુ બિલોકહિં ગંગ તરંગા।।
સચિવહિ અનુજહિ પ્રિયહિ સુનાઈ। બિબુધ નદી મહિમા અધિકાઈ।।
મજ્જનુ કીન્હ પંથ શ્રમ ગયઊ। સુચિ જલુ પિઅત મુદિત મન ભયઊ।।
સુમિરત જાહિ મિટઇ શ્રમ ભારૂ। તેહિ શ્રમ યહ લૌકિક બ્યવહારૂ।।

3.1.87

चौपाई
દેખિ રસાલ બિટપ બર સાખા। તેહિ પર ચઢ઼ેઉ મદનુ મન માખા।।
સુમન ચાપ નિજ સર સંધાને। અતિ રિસ તાકિ શ્રવન લગિ તાને।।
છાડ઼ે બિષમ બિસિખ ઉર લાગે। છુટિ સમાધિ સંભુ તબ જાગે।।
ભયઉ ઈસ મન છોભુ બિસેષી। નયન ઉઘારિ સકલ દિસિ દેખી।।
સૌરભ પલ્લવ મદનુ બિલોકા। ભયઉ કોપુ કંપેઉ ત્રૈલોકા।।
તબ સિવતીસર નયન ઉઘારા। ચિતવત કામુ ભયઉ જરિ છારા।।
હાહાકાર ભયઉ જગ ભારી। ડરપે સુર ભએ અસુર સુખારી।।
સમુઝિ કામસુખુ સોચહિં ભોગી। ભએ અકંટક સાધક જોગી।।

2.7.87

चौपाई
এক পিতা কে বিপুল কুমারা৷ হোহিং পৃথক গুন সীল অচারা৷৷
কোউ পংডিংত কোউ তাপস গ্যাতা৷ কোউ ধনবংত সূর কোউ দাতা৷৷
কোউ সর্বগ্য ধর্মরত কোঈ৷ সব পর পিতহি প্রীতি সম হোঈ৷৷
কোউ পিতু ভগত বচন মন কর্মা৷ সপনেহুজান ন দূসর ধর্মা৷৷
সো সুত প্রিয পিতু প্রান সমানা৷ জদ্যপি সো সব ভাি অযানা৷৷
এহি বিধি জীব চরাচর জেতে৷ ত্রিজগ দেব নর অসুর সমেতে৷৷
অখিল বিস্ব যহ মোর উপাযা৷ সব পর মোহি বরাবরি দাযা৷৷
তিন্হ মহজো পরিহরি মদ মাযা৷ ভজৈ মোহি মন বচ অরূ কাযা৷৷

2.6.87

चौपाई
এহীং বীচ নিসাচর অনী৷ কসমসাত আঈ অতি ঘনী৷
দেখি চলে সন্মুখ কপি ভট্টা৷ প্রলযকাল কে জনু ঘন ঘট্টা৷৷
বহু কৃপান তরবারি চমংকহিং৷ জনু দহদিসি দামিনীং দমংকহিং৷৷
গজ রথ তুরগ চিকার কঠোরা৷ গর্জহিং মনহুবলাহক ঘোরা৷৷
কপি লংগূর বিপুল নভ ছাএ৷ মনহুইংদ্রধনু উএ সুহাএ৷৷
উঠই ধূরি মানহুজলধারা৷ বান বুংদ ভৈ বৃষ্টি অপারা৷৷
দুহুদিসি পর্বত করহিং প্রহারা৷ বজ্রপাত জনু বারহিং বারা৷৷
রঘুপতি কোপি বান ঝরি লাঈ৷ ঘাযল ভৈ নিসিচর সমুদাঈ৷৷
লাগত বান বীর চিক্করহীং৷ ঘুর্মি ঘুর্মি জহতহমহি পরহীং৷৷

2.2.87

चौपाई
সীতা সচিব সহিত দোউ ভাঈ৷ সৃংগবেরপুর পহুে জাঈ৷৷
উতরে রাম দেবসরি দেখী৷ কীন্হ দংডবত হরষু বিসেষী৷৷
লখন সচিবসিযকিএ প্রনামা৷ সবহি সহিত সুখু পাযউ রামা৷৷
গংগ সকল মুদ মংগল মূলা৷ সব সুখ করনি হরনি সব সূলা৷৷
কহি কহি কোটিক কথা প্রসংগা৷ রামু বিলোকহিং গংগ তরংগা৷৷
সচিবহি অনুজহি প্রিযহি সুনাঈ৷ বিবুধ নদী মহিমা অধিকাঈ৷৷
মজ্জনু কীন্হ পংথ শ্রম গযঊ৷ সুচি জলু পিঅত মুদিত মন ভযঊ৷৷
সুমিরত জাহি মিটই শ্রম ভারূ৷ তেহি শ্রম যহ লৌকিক ব্যবহারূ৷৷

2.1.87

चौपाई
দেখি রসাল বিটপ বর সাখা৷ তেহি পর চঢ়েউ মদনু মন মাখা৷৷
সুমন চাপ নিজ সর সংধানে৷ অতি রিস তাকি শ্রবন লগি তানে৷৷
ছাড়ে বিষম বিসিখ উর লাগে৷ ছুটি সমাধি সংভু তব জাগে৷৷
ভযউ ঈস মন ছোভু বিসেষী৷ নযন উঘারি সকল দিসি দেখী৷৷
সৌরভ পল্লব মদনু বিলোকা৷ ভযউ কোপু কংপেউ ত্রৈলোকা৷৷
তব সিবতীসর নযন উঘারা৷ চিতবত কামু ভযউ জরি ছারা৷৷
হাহাকার ভযউ জগ ভারী৷ ডরপে সুর ভএ অসুর সুখারী৷৷
সমুঝি কামসুখু সোচহিং ভোগী৷ ভএ অকংটক সাধক জোগী৷৷

1.7.87

चौपाई
एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।।
कोउ पंडिंत कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता।।
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।।
कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।।
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना।।
एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते।।
अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया।।
तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरू काया।।

1.6.87

चौपाई
एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी।
देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा।।
बहु कृपान तरवारि चमंकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं।।
गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा।।
कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए।।
उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा।।
दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा।।
रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई।।
लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं।।

1.2.87

चौपाई
सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।।
उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।।
लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।।
गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।।
कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।।
सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।।
मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।।
सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।

दोहा/सोरठा

1.1.87

चौपाई
देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा।।
सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने।।
छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छुटि समाधि संभु तब जागे।।
भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी।।
सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका।।
तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा।।
हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी।।
समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी।।

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