128

4.1.128

चौपाई
ರಾಮ ಕೀನ್ಹ ಚಾಹಹಿಂ ಸೋಇ ಹೋಈ. ಕರೈ ಅನ್ಯಥಾ ಅಸ ನಹಿಂ ಕೋಈ..
ಸಂಭು ಬಚನ ಮುನಿ ಮನ ನಹಿಂ ಭಾಏ. ತಬ ಬಿರಂಚಿ ಕೇ ಲೋಕ ಸಿಧಾಏ..
ಏಕ ಬಾರ ಕರತಲ ಬರ ಬೀನಾ. ಗಾವತ ಹರಿ ಗುನ ಗಾನ ಪ್ರಬೀನಾ..
ಛೀರಸಿಂಧು ಗವನೇ ಮುನಿನಾಥಾ. ಜಹಬಸ ಶ್ರೀನಿವಾಸ ಶ್ರುತಿಮಾಥಾ..
ಹರಷಿ ಮಿಲೇ ಉಠಿ ರಮಾನಿಕೇತಾ. ಬೈಠೇ ಆಸನ ರಿಷಿಹಿ ಸಮೇತಾ..
ಬೋಲೇ ಬಿಹಸಿ ಚರಾಚರ ರಾಯಾ. ಬಹುತೇ ದಿನನ ಕೀನ್ಹಿ ಮುನಿ ದಾಯಾ..
ಕಾಮ ಚರಿತ ನಾರದ ಸಬ ಭಾಷೇ. ಜದ್ಯಪಿ ಪ್ರಥಮ ಬರಜಿ ಸಿವರಾಖೇ..

दोहा/सोरठा
ರೂಖ ಬದನ ಕರಿ ಬಚನ ಮೃದು ಬೋಲೇ ಶ್ರೀಭಗವಾನ .
ತುಮ್ಹರೇ ಸುಮಿರನ ತೇಂ ಮಿಟಹಿಂ ಮೋಹ ಮಾರ ಮದ ಮಾನ..128..

3.7.128

चौपाई
મતિ અનુરૂપ કથા મૈં ભાષી। જદ્યપિ પ્રથમ ગુપ્ત કરિ રાખી।।
તવ મન પ્રીતિ દેખિ અધિકાઈ। તબ મૈં રઘુપતિ કથા સુનાઈ।।
યહ ન કહિઅ સઠહી હઠસીલહિ। જો મન લાઇ ન સુન હરિ લીલહિ।।
કહિઅ ન લોભિહિ ક્રોધહિ કામિહિ। જો ન ભજઇ સચરાચર સ્વામિહિ।।
દ્વિજ દ્રોહિહિ ન સુનાઇઅ કબહૂ સુરપતિ સરિસ હોઇ નૃપ જબહૂ।
રામ કથા કે તેઇ અધિકારી। જિન્હ કેં સતસંગતિ અતિ પ્યારી।।
ગુર પદ પ્રીતિ નીતિ રત જેઈ। દ્વિજ સેવક અધિકારી તેઈ।।
તા કહયહ બિસેષ સુખદાઈ। જાહિ પ્રાનપ્રિય શ્રીરઘુરાઈ।।

3.2.128

चौपाई
સુનિ મુનિ બચન પ્રેમ રસ સાને। સકુચિ રામ મન મહુમુસુકાને।।
બાલમીકિ હિ કહહિં બહોરી। બાની મધુર અમિઅ રસ બોરી।।
સુનહુ રામ અબ કહઉનિકેતા। જહાબસહુ સિય લખન સમેતા।।
જિન્હ કે શ્રવન સમુદ્ર સમાના। કથા તુમ્હારિ સુભગ સરિ નાના।।
ભરહિં નિરંતર હોહિં ન પૂરે। તિન્હ કે હિય તુમ્હ કહુગૃહ રૂરે।।
લોચન ચાતક જિન્હ કરિ રાખે। રહહિં દરસ જલધર અભિલાષે।।
નિદરહિં સરિત સિંધુ સર ભારી। રૂપ બિંદુ જલ હોહિં સુખારી।।
તિન્હ કે હૃદય સદન સુખદાયક। બસહુ બંધુ સિય સહ રઘુનાયક।।

3.1.128

चौपाई
રામ કીન્હ ચાહહિં સોઇ હોઈ। કરૈ અન્યથા અસ નહિં કોઈ।।
સંભુ બચન મુનિ મન નહિં ભાએ। તબ બિરંચિ કે લોક સિધાએ।।
એક બાર કરતલ બર બીના। ગાવત હરિ ગુન ગાન પ્રબીના।।
છીરસિંધુ ગવને મુનિનાથા। જહબસ શ્રીનિવાસ શ્રુતિમાથા।।
હરષિ મિલે ઉઠિ રમાનિકેતા। બૈઠે આસન રિષિહિ સમેતા।।
બોલે બિહસિ ચરાચર રાયા। બહુતે દિનન કીન્હિ મુનિ દાયા।।
કામ ચરિત નારદ સબ ભાષે। જદ્યપિ પ્રથમ બરજિ સિવરાખે।।

दोहा/सोरठा
રૂખ બદન કરિ બચન મૃદુ બોલે શ્રીભગવાન ।
તુમ્હરે સુમિરન તેં મિટહિં મોહ માર મદ માન।।128।।

2.7.128

चौपाई
মতি অনুরূপ কথা মৈং ভাষী৷ জদ্যপি প্রথম গুপ্ত করি রাখী৷৷
তব মন প্রীতি দেখি অধিকাঈ৷ তব মৈং রঘুপতি কথা সুনাঈ৷৷
যহ ন কহিঅ সঠহী হঠসীলহি৷ জো মন লাই ন সুন হরি লীলহি৷৷
কহিঅ ন লোভিহি ক্রোধহি কামিহি৷ জো ন ভজই সচরাচর স্বামিহি৷৷
দ্বিজ দ্রোহিহি ন সুনাইঅ কবহূ সুরপতি সরিস হোই নৃপ জবহূ৷
রাম কথা কে তেই অধিকারী৷ জিন্হ কেং সতসংগতি অতি প্যারী৷৷
গুর পদ প্রীতি নীতি রত জেঈ৷ দ্বিজ সেবক অধিকারী তেঈ৷৷
তা কহযহ বিসেষ সুখদাঈ৷ জাহি প্রানপ্রিয শ্রীরঘুরাঈ৷৷

2.2.128

चौपाई
সুনি মুনি বচন প্রেম রস সানে৷ সকুচি রাম মন মহুমুসুকানে৷৷
বালমীকি হি কহহিং বহোরী৷ বানী মধুর অমিঅ রস বোরী৷৷
সুনহু রাম অব কহউনিকেতা৷ জহাবসহু সিয লখন সমেতা৷৷
জিন্হ কে শ্রবন সমুদ্র সমানা৷ কথা তুম্হারি সুভগ সরি নানা৷৷
ভরহিং নিরংতর হোহিং ন পূরে৷ তিন্হ কে হিয তুম্হ কহুগৃহ রূরে৷৷
লোচন চাতক জিন্হ করি রাখে৷ রহহিং দরস জলধর অভিলাষে৷৷
নিদরহিং সরিত সিংধু সর ভারী৷ রূপ বিংদু জল হোহিং সুখারী৷৷
তিন্হ কে হৃদয সদন সুখদাযক৷ বসহু বংধু সিয সহ রঘুনাযক৷৷

2.1.128

चौपाई
রাম কীন্হ চাহহিং সোই হোঈ৷ করৈ অন্যথা অস নহিং কোঈ৷৷
সংভু বচন মুনি মন নহিং ভাএ৷ তব বিরংচি কে লোক সিধাএ৷৷
এক বার করতল বর বীনা৷ গাবত হরি গুন গান প্রবীনা৷৷
ছীরসিংধু গবনে মুনিনাথা৷ জহবস শ্রীনিবাস শ্রুতিমাথা৷৷
হরষি মিলে উঠি রমানিকেতা৷ বৈঠে আসন রিষিহি সমেতা৷৷
বোলে বিহসি চরাচর রাযা৷ বহুতে দিনন কীন্হি মুনি দাযা৷৷
কাম চরিত নারদ সব ভাষে৷ জদ্যপি প্রথম বরজি সিবরাখে৷৷

दोहा/सोरठा
রূখ বদন করি বচন মৃদু বোলে শ্রীভগবান ৷
তুম্হরে সুমিরন তেং মিটহিং মোহ মার মদ মান৷৷128৷৷

1.7.128

चौपाई
मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।।
तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई।।
यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि।।
कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।।
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।।
राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी।।
गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई।।
ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई।।

1.2.128

चौपाई
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।।
बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।।
सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।।
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।
निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।।
तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।

1.1.128

चौपाई
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई।।
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए।।
एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना।।
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा।।
हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता।।
बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया।।
काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे।।
अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया।।

दोहा/सोरठा

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